प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत

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प्राचीन भारतीय इतिहास के स्त्रोत




धार्मिक-साहित्यिक स्त्रोत
ब्राह्मण साहित्य-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद,
ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, महाभारत, रामायण, पुराण।
बौद्ध साहित्य-सुत्तपिटक, विनयपिटक, अभिधम्मपिटक,
महावंश, दीपवंश, ललित विस्तार, बुद्धचरित (रचनाकार-
अश्वघोष), महाविभाष (रचनाकार-वसुमित्र), जातक आदि।
जैन ग्रन्थ-कल्पसूत्र, भगवती सूत्र, आचारांग सूत्र इत्यादि।
अर्द्ध ऐतिहासिक साहित्यिक स्त्रोत
स्वप्नवासवदत्ता, प्रतिज्ञायौगन्धरायण (रचनाकार भास,
जो संस्कृत के प्रथम नाटककार थे), मुद्राराक्षस (विशाखदत्त कृत), अभिज्ञान शाकुन्तलम् (कालिदास), अर्थशास्त्र (कौटिल्य/
चाणक्य/विष्णुगुप्त कृत) आदि।
ऐतिहासिक साहित्यिक स्त्रोत
हर्षचरित (बाणभट्ट), पृथ्वीराज रासो (चन्दवरदाई कृत),
राजतरंगिणी (कल्हण)।
राजतरंगिणी की रचना 12वीं सदी में कल्हण के द्वारा की
गई थी। पहली बार ऐतिहासिकता की झलक इसी ग्रन्थ में
मिलती है। इसकी भाषा संस्कृत है।
पुरातात्विक स्त्रोत
जो स्तम्भों, गुफाओं, मूर्तियों, मुद्राओं, शिलाओं आदि पर
उत्कीर्ण होते हैं, अभिलेख कहलाते हैं।
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अभिलेख सम्राट अशोक के हैं, जिसको
पहली बार 1837 में जेम्स प्रिन्सेप ने पढ़ा था।
प्राचीन भारतीय इतिहास के साहित्यिक स्त्रोत ग्रंथ








  • ऐतिहासिक ग्रन्थों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण 12वीं शताब्दी
  • में कल्हण द्वारा रचित ‘राजतरंगिणी’ है।
  • ‘महावंश’ व ‘दीपवंश’ नामक बौद्ध ग्रन्थ दक्षिणी बौद्धमत
  • के ग्रन्थ हैं।
  • बौद्धग्रन्थ ‘ललित विस्तार’ की रचना नेपाल में हुई थी।
  • ऐतिहासिक महत्त्व के ‘प्रथम ग्रन्थ’ की रचना हर्ष के
  • दरबारी कवि बाणभट्ट ने ‘हर्षचरित’ के रूप में की थी।
  • पतंजलि ने ‘महाभाष्य’ की रचना की।
  • भारत के प्राचीन सिक्के पञ्चमार्क या आहत सिक्के कहलाते
  • हैं जो 5वीं-6वीं शताब्दी ई. पू. के हैं।
  • ये सिक्के अधिकांशत: चाँदी व कुछ ताँबे के हैं।
  • सिक्कों का अध्ययन न्यूमिसमेटिक्स (Numesmatics)
  • के अन्तर्गत किया जाता है।
  • भारत में पहली बार ‘लिखित’ स्वर्ण सिक्के चलाने वाले
  • इण्डो-ग्रीक (अथवा हिन्द-यवन) थे।
  • साहित्य में सिक्कों को ‘कार्षापण’ कहा गया है।
  • जिन्सेन्ट आर्थर स्मिथ ने प्राचीन भारत का पहला सुनियोजित
  • इतिहास- अर्ली हिस्ट्री ऑफ इण्डिया ( 1904) लिखा।
  • हिन्दू पॉलिटी के लेखक-के. पी. जायसवाल हैं।
  • कलिंगराज खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख, समुद्र गुप्त
  • का प्रयाग प्रशस्ति, स्कंद गुप्त का भीतरी स्तम्भ लेख।
  • रूद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत भाषा में जारी प्रथम
  • अभिलेख माना जाता है।
  • उत्कीर्ण लेखों का अध्ययन ‘एपीग्राफी’ (पुरालेख शास्त्र) के
  • अन्तर्गत किया जाता है।
  • अभिलेखों के अतिरिक्त सिक्के (मुहरें), स्मारक व भवन,
  • मूर्तियां, चित्रकला, भौतिक अवशेष, मृद्भाण्ड, आभूषण
  • एवं अस्त्र-शस्त्र भी पुरातात्विक स्त्रोत के अंतर्गत आते हैं।




विदेशी विवरण
  • हेरोडोटस की रचना हिस्टोरिका से भारत-ईरान संबंध तथा
  • उत्तर-पश्चिम भारत की जानकारी मिलती है।
  • मेगस्थनीज, जो सैल्यूकस के राजदूत के रूप में मौर्य शासक
  • चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में 14 वर्षों तक रहा, की रचना
  • ‘इण्डिका’ मूल रूप में अप्राप्य है। इसके कुछ अंश उद्धरण
  • के रूप में एरियन, स्ट्रेबो, प्लुटार्क, जस्टिन आदि की
  • कृतियों में प्राप्त होते हैं।
  • एक अज्ञात यूनानी लेखक ने ईसवी सन् की पहली सदी में
  • भारतीय बंदरगाहों, प्राकृतिक स्थिति व व्यापार पर प्रकाश
  • अपनी कृति-‘पेरीप्लस ऑफ द एरिध्रियन सी’ (लाल
  • सागर का विवरण) में दिया।
  • टॉलेमी ने ‘ज्योग्राफी’ (150 ई. के आसपास) लिखा ।
  • चीनी यात्री भारत में बौद्ध धर्म के अध्ययन व बौद्ध तीर्थस्थलों
  • की यात्रा के उद्देश्य से आते थे।
  • “सर्वप्रथम फाह्यान” चन्द्रगुप्त-II विक्रमादित्य (गुप्तवंशीय
  • शासक) के शासनकाल में 375-415 ई. के बीच आया
  • था, उसने फू-को-की (FU-KO-KI) की रचना की।
  • फाह्यान ने अपने यात्रा वृतांत में गुप्त शासक के नाम का उल्लेख नहीं किया है।
  • सुंगयुन 518 ई. में आया था।
  • ह्वेन सांग (या युवान च्वांग) हर्ष के समय 629 ई. में आया
  • उसने ‘सी-यू-की’ की रचना की।
  • ह्रेन सांग के मित्र ‘व्ही ली’ ने हरेनसांग की जीवनी लिखी थी।
  • अरबों से भी भारत की जानकारी प्राप्त होती है। अरबों में सबसे
  • प्रसिद्ध अबूरिहान मुहम्मद बिन अलबरूनी का विवरण है।
  • अलबरूनी का जन्म 973ई. में खीवा (ख्वारिज्म) में हुआ था।
  • उसने ‘तहकीक-ए-हिन्द’ (भारत की खोज) की रचना की।
  • अलबरूनी ने अपने ग्रन्थ में यहां के निवासियों की दशा का वर्णन किया है।









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